मजबूरी का ये अजब दस्तूर है

मजबूरी  का  ये  अजब  दस्तूर है
तुम सामने हो फिर भी दिल मजबूर है
कुछ कह नहीं सकते किसी से

ये जुबान खामोश है ये मजबूर
इधर भी है उधर भी है
मेरी उदास नजरों में एक मूरत उभर आई है
तुम सामने हो फिर भी तुम्हारी याद दिल को आई है
बेचैनी दिल में इस कदर बढ़ गई मेरी 
आंखों  में  अश्कों  की  नदी उतर गई 


खुशी दो पल की मिली थी मगर
उसकी यादों में ये नजरें आंसू बहा रही है

j tras

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