चारों और घटा छाने लगी है

   चारों और घटा छाने लगी है ,  
   मुझको तेरी याद सताने लगी है
   कब आओगे लौट कर तुम सनम
  ,जिंदगी मेरे हाथों से जाने लगी है
 

जिंदगी सजी रही कांटों भरी राहों से सदा,                  
होठों पर तेरा नाम लिए हम चलते रहे मुंह
से कुछ ना कहा   एक पल भी
तुमने हमारा हाथ थामा ही नहीं                    
ये  कैसा मुकद्दर है जिसमें दर्द के सिवा
                    


                   




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