भटका हुआ हूं कब से मंजिल को ढूंढता हूं
दोस्तों की महफिल में दुश्मनों को ढूंढता हूं
दोस्तों की महफिल में दुश्मनों को ढूंढता हूं
फूलों के बागों में जाकर कांटों को ढूंढता हूं
दिल की बात कहने के लिए साथी को ढूंढता हूं
तेरे ख्याल तेरी रहगुजर में रहता हूं
जमाना समझता है मैं घर में रहता हूं
मेरा दिल ठहरता नहीं एक पल को भी
मैं घर में रहकर भी तेरी यादों के सफ़र में रहता हूं
दिल की प्यास कभी बोलती नहीं
इश्क की आग कभी बुझती नहीं
नजरें ढूंढती है जिस मंजिल को
वो मंजिल मेरे दिल को कभी मिलती नहीं
इश्क की आग कभी बुझती नहीं
नजरें ढूंढती है जिस मंजिल को
वो मंजिल मेरे दिल को कभी मिलती नहीं